📌 1. साझेदारी व संलेख
- भारतीय साझेदारी अधिनियम 1932, धारा 4: "उन व्यक्तियों के बीच संबंध जिन्होंने सभी द्वारा या सबकी ओर से कार्य करने वाले किसी एक द्वारा चलाए गए व्यवसाय के लाभ बाँटने का समझौता किया है।"
- न्यूनतम 2 साझेदार; अधिकतम 50 (कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 464 व कंपनी (विविध) नियम 2014)।
- साझेदारी संलेख (Deed) — लिखित समझौता: लाभ अनुपात, पूँजी, ब्याज, वेतन, आहरण आदि। पंजीकरण अनिवार्य नहीं, पर वांछनीय।
- सीमित दायित्व साझेदारी (LLP) अलग कानून — LLP अधिनियम 2008 के अंतर्गत।
| मद | संलेख के अभाव में नियम (धारा 13) |
|---|---|
| लाभ-हानि बँटवारा | बराबर |
| पूँजी पर ब्याज | नहीं दिया जाएगा |
| आहरण पर ब्याज | नहीं लिया जाएगा |
| साझेदार को वेतन/कमीशन | नहीं |
| साझेदार के ऋण पर ब्याज | 6% वार्षिक |
📌 2. स्थायी व परिवर्तनशील पूँजी
| आधार | स्थायी पूँजी विधि | परिवर्तनशील पूँजी विधि |
|---|---|---|
| खाते | दो — पूँजी खाता व चालू खाता | एक — केवल पूँजी खाता |
| ब्याज, वेतन, लाभ, आहरण | चालू खाते में | पूँजी खाते में |
| शेष | पूँजी खाते का सदा जमा; चालू खाते का नाम या जमा | सामान्यतः जमा, कभी नाम |
📌 3. लाभ-हानि विनियोजन खाता
यह लाभ-हानि खाते का विस्तार है जो दिखाता है कि शुद्ध लाभ साझेदारों में कैसे बँटा। नाम: पूँजी पर ब्याज, साझेदार वेतन/कमीशन, संचय में स्थानांतरण, शेष लाभ। जमा: शुद्ध लाभ, आहरण पर ब्याज।
| लाभ-हानि विनियोजन खाता (A व B, अनुपात 3:2) | |||||
|---|---|---|---|---|---|
| नाम: तिथि | विवरण | ₹ | जमा: तिथि | विवरण | ₹ |
| पूँजी पर ब्याज से: A 6,000; B 4,000 | 10,000 | शुद्ध लाभ (लाभ-हानि खाते से) द्वारा | 1,00,000 | ||
| B के वेतन से | 12,000 | आहरण पर ब्याज द्वारा: A | 1,000 | ||
| शेष लाभ से: A 47,400; B 31,600 | 79,000 | ||||
| योग | 1,01,000 | योग | 1,01,000 | ||
गणना: 1,00,000 + 1,000 − 10,000 − 12,000 = 79,000; A = 79,000 × 3/5 = 47,400; B = 31,600।
- साझेदार के ऋण पर ब्याज लाभ पर भार (charge) है → लाभ-हानि खाते में, विनियोजन खाते में नहीं।
- पूँजी पर ब्याज लाभ का विनियोजन है — हानि होने पर (संलेख में अन्यथा न हो तो) नहीं दिया जाता।
📌 4. आहरण पर ब्याज
| आहरण का समय (हर माह बराबर, 12 माह) | औसत अवधि |
|---|---|
| हर माह के आरंभ में | 6.5 माह |
| हर माह के मध्य में | 6 माह |
| हर माह के अंत में | 5.5 माह |
उदाहरण: हर माह के आरंभ में ₹2,000 आहरण, ब्याज 10% वार्षिक → 24,000 × 10% × 6.5/12 = ₹1,300।
- संलेख न हो तो साझेदार के ऋण पर 6% ब्याज मिलता है, पर पूँजी पर कुछ नहीं।
- विनियोजन खाता केवल साझेदारी/कंपनी में; एकल स्वामी में शुद्ध लाभ सीधे पूँजी में।
📌 5. हल किए गए उदाहरण
उदाहरण: लाभ-हानि विनियोजन खाता
A और B की पूँजी ₹2,00,000 व ₹1,00,000; पूँजी पर ब्याज 10%; B का वार्षिक वेतन ₹24,000; आहरण पर ब्याज A ₹2,000, B ₹1,000; शुद्ध लाभ (विनियोजन से पहले) ₹90,000; लाभ अनुपात 3:2।
| लाभ-हानि विनियोजन खाता | |||
|---|---|---|---|
| नाम: विवरण | ₹ | जमा: विवरण | ₹ |
| पूँजी पर ब्याज — A | 20,000 | शुद्ध लाभ | 90,000 |
| पूँजी पर ब्याज — B | 10,000 | आहरण पर ब्याज — A | 2,000 |
| B का वेतन | 24,000 | आहरण पर ब्याज — B | 1,000 |
| लाभ — A (3/5) | 23,400 | योग | 93,000 |
| लाभ — B (2/5) | 15,600 | ||
| योग | 93,000 | ||
विभाज्य लाभ = 93,000 − (20,000 + 10,000 + 24,000) = ₹39,000; A = 39,000 × 3/5 = ₹23,400, B = ₹15,600। साझेदार के ऋण पर ब्याज होता तो वह लाभ-हानि खाते में (भार के रूप में) जाता, विनियोजन खाते में नहीं।
📌 6. Practice MCQs
1 अक्टूबर 1932 से प्रभावी (धारा 69 को छोड़कर)।
धारा 13(b)।
धारा 13(d)।
संलेख में प्रावधान हो तभी।
कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 464 व नियम 2014।
यह लाभ पर भार है।
यह फर्म की आय है।
ब्याज, वेतन, लाभ चालू खाते में।
(12 + 1) ÷ 2 = 6.5।
24,000 × 10% × 6.5/12 = 1,300।
1,00,000 + 1,000 − 10,000 − 12,000।
अपंजीकृत फर्म पर कुछ विधिक सीमाएँ (धारा 69) लागू।
केवल एक खाता — पूँजी खाता।
शुद्ध लाभ का वितरण दिखाता है।
LLP पर 1932 का अधिनियम लागू नहीं।
(11 + 0) ÷ 2 = 5.5।
चालू खाते का शेष नाम या जमा हो सकता है।
धारा 13 संलेख के अभाव के नियम देती है।
79,000 × 3/5।
यह लाभ का विनियोजन है, भार नहीं।